बिछड़ने वाली शायरी

कुछ बहुत अजीब था, उसकी आँखों में शायद*
तभी तो उसको देखे बिना, मेरा गुज़ारा ना रहा**
तुझे क्या पता, कि चाँद निकलता था तेरे दरवाज़े से*
तुझको देखा नही अगर, तो मेरी ईद ना हुई**
पंछी जिस तरह, अपने घोंसले से जुदा होता है*
उस तरह मैंने भी ख़ुद को देखा है, फड़फड़ाते हुए**
मगर उसने तो, दूसरे दरख़्त पर बना लिया घर अपना*
मेरा तो उस दिन से, किसी घर में गुज़ारा ना हुआ**
बहुत नाज़ है तुझको ऐ! दरख़्त, अपनी फूलों की डाली पर*
बदलेगा मौसम करवट जिस दिन, वो डाली भी टूट जाएगी***

Comments

  1. What do you think about this Shayari guys tell me something..

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